Wednesday, 3 May 2017

तरही ग़ज़ल !

मेरे अक्स में फिर अक्स तेरा न लगे।
जुस्तजु न रहे तेरी कोई रिशता न लगे।

तुझे भूलने की नाकाम कौशिश करूं ;
मेरी रुह से तू कहीं मगर जुदा न लगे।

कैफ़ियत कैसी है जिस्त की क्या कहूं ;
मेरा था वो पर अब क्यों मेरा न लगे।

ताउम्र न भूलेंगे जफ़ाएं तेरी रहबर;
कि तेरे बाद मुझे कोई बेवफा न लगे।

देख हालत मेरी रो उठी है कायनात भी;
यूं किसी को भी प्यार की बद्दुआ न लगे।

कामनी गुप्ता***
जम्मू !

No comments:

Post a Comment